सप्ताह के व्रत और त्योहार (1 से 7 जून): आइये जानते हैं गंगा दशहरा से लेकर मांद्य चंद्र ग्रहण तक का महत्व

जाने इस सप्ताह के व्रत-त्योहारों का महत्व

वर्तमान सप्ताह का शुभारंभ ज्येष्ठ के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि और हस्त नक्षत्र के साथ हो रहा है। संयोगवश इस दिन गंगा दशहरा भी है। वर्तमान शुक्ल पक्ष 5 जून को समाप्त हो जाएगा और उससे अगले दिन यानी 6 जून शनिवार से आषाढ़ मास का कृष्ण पक्ष आरंभ हो जाएगा। इस सप्ताह के अंत में अर्थात् शनिवार 6 जून को चंद्र ग्रहण भी लग रहा है। दरअसल यह उपछाया/मांद्य चंद्र ग्रहण है, जिसमें चंद्रमा में कोई ग्रहण नहीं लगता है बल्कि उसकी छाया थोड़ी मद्धम पड़ जाती है।

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गंगा दशहरा (1 जून, सोमवार)

हमारे प्राचीन शास्त्रों में कहा गया है कि ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि के दिन ही पुण्यतोया मां गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था। तभी से इस तिथि को गंगा दशहरा के रूप में मनाने की परम्परा आरंभ हो गई। ऐसा कहा गया है कि इस दिन मां गंगा का व्रत, गंगा स्नान और गंगा का विधिपूर्वक पूजन करने से उपासक को तीन प्रकार के शारीरिक, चार प्रकार के वाचिक और तीन प्रकार के मानसिक- इन दस पापों से मुक्ति मिल जाती है। इस दिन गंगा में स्नान करने वाले को बैकुंठलोक की प्राप्ति होती है।

निर्जला एकादशी व्रत (2 जून, मंगलवार)

हिंदू पंचांग के अनुसार एक वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं, लेकिन ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को सर्वश्रेष्ठ एकादशी माना जाता है, क्योंकि इस दिन घड़े और पंखों के दान का विशेष महत्व है, इसलिए इसे घड़े पंखों की एकादशी भी कहा जाता है। पुराणों में कहा गया है कि इस दिन व्रत रखने वाले को सभी तीर्थों के दर्शन का पुण्य और चौदह एकादशियों के व्रत का पुण्य और फल प्राप्त होता है। महाभारत काल में पांडुपुत्र भीम को भूख बहुत लगती थी, वह एकादशी का व्रत नहीं रख पाता था, जबकि बाकी चारों पांडव व्रत रखते थे। पर महर्षि व्यास के कहने से उसने बड़ी मुश्किल से यह व्रत रखा इसलिए इसे भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है।

बुध प्रदोष व्रत (3 जून, बुधवार)

जिस तरह प्रत्येक माह के दोनों पक्षों में एक एक बार एकादशी का व्रत होता है, ठीक उसी प्रकार त्रयोदशी को प्रदोष का व्रत रखा जाता है। एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है तो त्रयोदशी का व्रत भगवान शंकर को। क्योंकि त्रयोदशी का व्रत शाम के समय रखा जाता है इसलिए इसे प्रदोष व्रत कहा जाता है। यह व्रत चूंकि भगवान शिव को समर्पित है इसलिए इस दिन उन्हीं की पूजा और अर्चना की जाती है। इस दिन ब्रह्मवेला में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर सबसे पहले ‘अद्य अहं महादेवस्य कृपाप्राप्त्यै सोमप्रदोषव्रतं करिष्ये’ यह कहकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए और फिर शिवजी की पूजा अर्चना करके सारा दिन उपवास रखना चाहिए। शाम के समय एक बार फिर से स्नान करके महादेव की अर्चना करके अन्न ग्रहण करना चाहिए।

श्री सत्यनारायण व्रत (5 जून, शुक्रवार)

सत्यनारायण का व्रत उत्तर भारत के कई घरों में किया जाता है। सनातनी हिंदुओं के यहां कोई भी पुण्यकार्य का अवसर हो, शादी-विवाह जैसा कोई मांगलिक आयोजन हो तो प्राय: घरों में भगवान सत्यनारायण की कथा करने की परंपरा पिछले कई सालों से चली आ रही है। सत्य ही भगवान हैं, नारायण हैं और सबसे बड़े आराध्य हैं। जो लोग रामायण पाठ या भागवत कथा जैसे लंबे आयोजन करने में समर्थ नहीं होते हैं वे सत्यनारायण की कथा कर लेते हैं। इस कथा को प्राय़: एकादशी या पूर्णिमा के दिन किया जाता है। इस व्रत के पीछे मूल उद्देश्य सत्य की पूजा करना है। इस व्रत में भगवान शालिग्राम का पूजन किया जाता है। शालिग्राम का अभिषेक, पूजन और अर्चन कर अपने सामर्थ्य के अनुसार दान आदि देना चाहिए।

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वट सावित्री व्रत (5 जून, शुक्रवार)

ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या के दिन वट सावित्री व्रत का विधान शास्त्रों में बताया गया है। इस व्रत को ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की अमावस्या से आरंभ किया जाता है और ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन पूरा किया जाता है। कहा जाता है कि वट वृक्ष का पूजन और व्रत करके ही सावित्री ने यमराज से अपने पति को वापस पा लिया था। तभी से पति की लंबी आयु के लिए इस व्रत का विधान प्रचलित हो गया।

ज्येष्ठ पूर्णिमा (5 जून, शुक्रवार)

पूर्णिमा और अमावस्या को प्राचीन हिंदू चिंतन परम्परा में बहुत महत्वपूर्ण बताया गया है। दरअसल इन दोनों तिथियों का सीधा संबंध चंद्रमा से है और चंद्रमा का संबंध हमारे मन से है। चंद्रमा की स्थिति हमारे मन को प्रभावित करती है। अमावस्या तिथि को यदि पितरों के लिए पिंड दान आदि की दृष्टि से महत्वपूर्ण है तो पूर्णिमा को पुण्यसलिला नदियों में स्नान और दान आदि से जोड़ा जाता है। पूर्णिमा एक मात्र ऐसी तिथि है जिस दिन कोई न कोई हिंदू पर्व अवश्य होता है।

मांद्य चंद्र ग्रहण (5 जून, शुक्रवार)

इस साल जून और जुलाई में कुल तीन ग्रहण लगने वाले हैं। इनमें से दो चंद्र ग्रहण होंगे और एक सूर्य ग्रहण होगा। 5 जून को लगने वाले चंद्रग्रहण को पूरे भारत के साथ साथ यूरोप, एशिया, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में भी देखा जा सकता है। 5 जून की रात 11 बजकर 16 मिनट से शुरू होकर अगले दिन यानी 6 जून की सुबह 2 बजकर 32 मिनट तक रहने वाला यह चंद्र ग्रहण दरअसल केवल मांद्य ग्रहण होगा। चूंकि यह केवल उपछाया ग्रहण है इसलिए इस ग्रहण से मानव जाति पर कोई दुष्प्रभाव नहीं होगा और न ही ग्रहण का कोई सूतक लगेगा।