सप्ताह के व्रत और त्योहार (4 से 10 मई): मोहिनी एकादशी से लेकर गणेश चतुर्थी व्रत तक का महत्व

वर्तमान सप्ताह का शुभारंभ वैशाख शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि और उत्तरा नक्षत्र के साथ हो रहा है। वर्तमान वैशाख शुक्ल पक्ष आगामी 7 मई को वैशाख पूर्णिमा के साथ समाप्त हो जाएगा। तदुपरान्त 8 मई से ज्येष्ठ का कृष्ण पक्ष आरंभ हो जाएगा। इस सप्ताह मोहिनी एकादशी, भौम प्रदोष व्रत, श्री नृसिंह जयन्ती, श्री सत्य नारायण व्रत, वैशाख/बुद्ध पूर्णिमा, वैशाख स्नान समाप्ति, गणेश चतुर्थी आदि का आयोजन किया जाएगा।

मोहिनी एकादशी (4 मई, सोमवार)

वैशाख शुक्ल पक्ष की 11वीं तिथि अर्थात् एकादशी के दिन मोहिनी एकादशी का व्रत रखने का विधान है। ऐसा विश्वास है कि इस व्रत को रखने से व्रती के समूचे पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है। एक बार गुरु वशिष्ठ के कहने पर भगवान राम ने भी यह व्रत रखा था और द्वापर युग में भगवान कृष्ण के कहने पर राजा युधिष्ठिर ने भी मोहिनी एकादशी का व्रत रखा था। इस दिन प्रात:काल स्नानादि से निवृत्त होकर भगवान राम की प्रतिमा के आगे बैठकर उनका पूजन अर्चन और स्तवन करना चाहिए। प्रतिमा का दूध और गंगाजल से अभिषेक कर श्वेत वस्त्रों से प्रतिमा का श्रृंगार कर पुष्प, अक्षत, धूप आदि से पूजन कर श्रीराम की आरती करनी चाहिए। तदनंतर भोग लगाकर दान आदि करना चाहिए और प्रसाद वितरण करना चाहिए।

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भौम प्रदोष व्रत (5 मई, मंगलवार)

भगवान शिव को समर्पित प्रदोष के व्रत का बहुत माहात्म्य है। ऐसा विश्वास है कि इस व्रत को रखने से महादेव प्रसन्न होते हैं और उपासक की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। जिस तरह हर महीने के दोनों पक्षों में एक-एक बार एकादशी का व्रत होता है, ठीक उसी प्रकार त्रयोदशी को प्रदोष का व्रत रखा जाता है। यदि एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है तो त्रयोदशी का व्रत भगवान शंकर को। क्योंकि त्रयोदशी का व्रत शाम के समय रखा जाता है इसलिए इसे प्रदोष व्रत कहा जाता है। सोमवार को यदि त्रयोदशी हो तो उसे सोम प्रदोष कहा जाता है और यदि मंगलवार को हो तो उसे भौम प्रदोष कहा जाता है। यह व्रत भगवान शिव को समर्पित है इसलिए इस दिन उन्हीं की पूजा और अर्चना की जाती है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन प्रदोष के समय भगवान शिव कैलाश पर्वत पर स्थित अपने रजत भवन में नृत्य करते हैं और सभी देवता उनकी स्तुति करते हैं।

श्री नृसिंह जयंती (6 मई, बुधवार)

वैशाख शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि नृसिंह जयंती के रूप में मनाने की परम्परा है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन भगवान नारायण ने नृसिंह का अवतार लेकर दैत्यराज हिरण्यकशिपु का वध किया था। भगवान नृसिंह का विशेष पूजन और अर्चन करने से वे प्रसन्न होते हैं और उपासक की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। इस दिन प्रात:काल उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान नृसिंह और मां लक्ष्मी की मंत्रोच्चार के साथ मूर्ति स्थापित कर विधि विधान के साथ पूजा करनी चाहिए।

श्री सत्यनारायण व्रत (6 मई, बुधवार)

श्री सत्यनारायण का व्रत उत्तर भारत के कई घरों में किया जाता है। सत्य ही भगवान हैं, नारायण हैं और सबसे बड़े आराध्य हैं। सनातनी हिंदुओं के यहां कोई भी पुण्यकार्य का अवसर हो, शादी-विवाह जैसा कोई मांगलिक आयोजन हो तो प्राय: घरों में भगवान सत्यनारायण की कथा करने की परंपरा पिछले कई सालों से चली आ रही है। जो लोग रामायण पाठ या भागवत कथा जैसे लंबे आयोजन करने में समर्थ नहीं होते हैं वे सत्यनारायण की कथा कर लेते हैं। इस कथा को प्राय़: एकादशी या पूर्णिमा के दिन किया जाता है।

वैशाख पूर्णिमा अथवा बुद्ध पूर्णिमा (7 मई, गुरुवार)

भगवान बुद्ध का वैशाख मास की पूर्णिमा के साथ विशेष संबंध रहा है। उनका जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महानिर्वाण तीनों ही घटनाएं वैशाख पूर्णिमा के दिन घटित हुईं, इसलिए इस पूर्णिमा को बौद्ध धर्म के अनुयायी बौद्ध पूर्णिमा के रूप में मनाते हैं। ऐसा महासंयोग किसी अन्य महापुरुष के साथ घटित हुआ हो, इसका उल्लेख कहीं भी नहीं पाया जाता। आज ही के दिन भगवान बुद्ध को बोधगया में पीपल के वृक्ष के नीचे बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी। इसी दिन ही उन्होंने गोरखपुर से 50 किलोमीटर दूर स्थित कुशीनगर में महानिर्वाण की ओर प्रस्थान किया था। इसी अवसर पर कुशीनगर के महापरिनिर्वाण मंदिर में एक महीने तक चलने वाले विशाल मेले का आयोजन किया जाता है जिसमें देश विदेश के लाखों बौद्ध अनुयायी पहुंचते हैं। लेकिन इस बार संभवत: कोरोना महाव्याधि के चलते यह आयोजन नहीं होगा। भारत सहित नेपाल, सिंगापुर, थाईलैंड, वियतनाम, कंबोडिया, मलेशिया आदि देशों में 50 करोड़ से अधिक अनुयायी बौद्ध पूर्णिमा को धूमधाम से मनाते हैं। श्रीलंका और दक्षिणपूर्व एशियाई देशों में इस उत्सव को ‘वेसाक’ के रूप में मनाया जाता है। वेसाक शब्द वैशाख का ही अपभ्रंश प्रतीत होता है। बोधगया में जिस वृक्ष के नीचे भगवान बुद्ध को बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी इस वृक्ष की जड़ों में दूध और सुगंधित पानी का सिंचन किया जाता है।

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वैशाख स्नान / वैशाख व्रत (7 मई, गुरुवार)

चैत्र शुक्ल पूर्णिमा से लेकर वैशाख की पूर्णिमा तक वैशाख स्नान का आयोजन चलता रहता है। स्कंद पुराण में कहा गया है कि वैशाख का महीना सब महीनों में सर्वोत्तम होता है। पुराण में यह भी कहा गया है कि इसी दिन महीरथ नामक राजा ने गंगा स्नान करके वैकुण्ठ धाम पा लिया था। इस दिन रखा गया व्रत व्रती की सभी मनोकामनाओं को पूरा करने वाला बताया गया है। इस दिन नदी में स्नान करके सूर्य को निम्न मंत्र के माध्यम से अर्घ्य देना चाहिए। व्रत वाले दिन भगवान मधुसूदन का पूजन, अर्चन और स्तवन करना चाहिये और केवल फलाहार करना चाहिए। व्रती को पूरा दिन ‘ओम् नमो भगवते वासुदेवाय’ का पाठ करते रहना चाहिए। स्कंदपुराण में इस दिन दान का भी विशेष महत्व बताया गया है।

गणेश चतुर्थी (10 मई, रविवार)

हर माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दिन भगवान गणेश को समर्पित गणेश चतुर्थी के व्रत का विधान है। इस दिन सर्वप्रथम प्रातःकाल उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान गणेश का स्मरण करते हुए ‘मम वर्तमानागामिसकल निवारणपूर्वक-सकल-अभीष्टसिद्धये गणेश चतुर्थीव्रतमहं करिष्ये’ इन पंक्तियों के साथ व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद पवित्र स्थान पर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करके गंध, पुष्प, अक्षत, रोली आदि से विधि विधान के साथ उनका पूजन, अर्चन और स्तवन करना चाहिए। उसके बाद भगवान गणेश को लड्डुओं का भोग लगाकर आरती कर पूरा दिन उपवास रखें और शाम को एक बार फिर उनका पूजन करें।