25 मार्च को मनाई जाएगी गुड़ी पड़वा, जानिए महत्‍व और ये खास बातें

गुड़ी पड़वा एक ऐसा पर्व है, जिसकी शुरुआत के साथ सनातन धर्म की कई सारी कहानियां जुड़ी हैं। इससे न केवल वासंतिक यानी कि चैत्र नवरात्र की दस्‍तक मानी जाती है बल्कि इससे हिंदू नववर्ष की भी शुरुआत मानी जाती है। बता दें कि चैत्र मास की शुक्‍ल प्रतिपदा को गुड़ी पड़वा या वर्ष प्रतिप्रदा या युगादि के नाम से जाना जाता है। इस बार गुड़ी पड़वा की तिथि 25 मार्च 2020 है। आइए जानते हैं गुड़ी पड़वा पर्व से जुड़ी मान्‍यताओं और किस्‍से-कहानियों को….

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सृष्टि के निर्माण और पंचांग की रचना का संबंध कहा जाता है कि गुड़ी पड़वा पर्व के दिन ही ब्रह्माजी ने सृष्टि का निर्माण किया था। यही वजह है इस तिथि को ‘नवसंवत्‍सर’ भी कहा जाता है। महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीने और वर्ष की गणना करते हुए ‘पंचांग’ की रचना भी इसी दिन की थी। इसलिए सनातन धर्म में गुड़ी पड़वा पर्व विशेष महत्‍व रखता है।

शालिवाहन शक का ऐसे हुआ आरंभ विद्वानों का मत है कि गुड़ी पड़वा की तिथि पर ही शालिवाहन शक भी आरंभ हुआ था। कथा मिलती है एक शालिवाहन नामक एक कुम्‍हार का बेटा था। शत्रु उसे बहुत परेशान करते थे। लेकिन अकेला होने के चलते वह उनका विरोध करने में सक्षम नहीं था। तब उसने एक युक्ति निकाली। उसने अपने शत्रुओं से लड़ने के लिए मिट्टी के सैनिकों की सेना बनाई। इसके बाद उनपर जल छिड़क कर प्राण डाल दिए। कहा जाता है कि जब शत्रु आए तो कुम्‍हार के बेटे ने जिस सेना को बनाया था। उन्‍होंने शत्रुओं के साथ युद्ध किया और विजय पाई। मान्‍यता है कि तब से ही शालिवाहन शक आरंभ हुआ।

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भगवान राम का भी है गुड़ी पड़वा से नाता मान्‍यता है कि रामायण काल में भगवान श्री राम ने जिस दिन वानरराज बाली के अत्‍याचारी शासन से दक्षिण की प्रजा को मुक्ति दिलाई थी। उस तिथि को ही गुड़ी पड़वा पर्व के नाम से जानते हैं। कथा मिलती है कि बाली के अत्‍याचार से मुक्‍त होकर वहां की प्रजा ने अपने घरों में एक विजय पताका फहराई जिसे गुड़ी कहा जाता है। यह प्रथा आगे चलकर ‘गुड़ी पड़वा’ के नाम से जानी गई।

यहां बंटता है खास प्रसाद, ठीक होते हैं चर्मरोग गुड़ी पड़वा पर्व को लेकर जहां अलग-अलग तरह की कथाएं प्रचलित हैं। वहीं आंध्रप्रदेश में तो इन दिन विशेष प्रसाद बांटा जाता है। मान्‍यता है कि निराहार रहकर जो भी व्‍यक्ति इस प्रसाद का सेवन करता है। वह निरोगी रहता है। यही नहीं यदि उसे किसी तरह की चर्मरोग है तो वह भी सही हो जाता है। आंध्र प्रदेश में मिलने वाले इस प्रसाद को खाने के लिए भारत के कोने-कोने से श्रद्धालु पहुंचते हैं।

इन स्‍थानों पर 9 दिनों तक चलता है यह पर्व चैत्र नवरात्र के प्रथम दिन को गुड़ी पड़वा के नाम से भी जाना जाता है। कुछ प्रदेशों में इसे केवल एक ही दिन यानी कि चैत्र मास की शुक्‍ल प्रतिपदा के दिन ही मनाया जाता है। लेकिन कुछ जगहों पर इसे पूरे नवरात्र यानी कि 9 दिनों तक मनाया जाता है। महाराष्‍ट्र, कर्नाटक और आंध प्रदेश में इस पर्व का समापन रामनवमी के शुभ अवसर पर प्रभु श्रीराम और देवी सीता के विवाह से होता है।