25 मार्च को गुड़ी पाड़वा, जानें शुभ मुहूर्त, कथा, महत्व, तोरण और पताका लगाने का नियम

Gudi Padwa 2020: गुड़ी पड़वा का पर्व महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और गोवा सहित दक्षिण भारतीय राज्यों में बड़े ही उल्लास के साथ मनाया जाता है। चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को गुड़ी पड़वा का त्यौहार मनाया जाता है। हिंदू धर्म में इस पर्व के लेकर काफी मान्यताएं है। मान्यताएं के अनुसार इस दिन बह्मा जी ने सृष्टि का निर्णाण किया था। इस बार गुड़ी पड़वा का पर्व 25 मार्च को मनाया जा रहा है। 

गुड़ी पड़वा पर्व तिथि व मुहूर्त 2020
प्रतिपदा तिथि आरंभ – 14:57 (24 मार्च 2020)
प्रतिपदा तिथि समाप्त – 17:26 (25 मार्च 2020)

ऐसे लगाएं पताका और तोरण
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को गुड़ी पाड़वा के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन घर में पताका और तोरण लगाने की परंपरा है।

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गुड़ी का अर्थ ही है – विजय पताका। घर में पताका लगाना व्यक्ति और उसके परिवार की जीत को दर्शता है। यह साक्षात विजय का प्रतीक है। इस दिन अपने घर के दक्षिण-पूर्व कोने यानि आग्नेय कोण में पांच हाथ ऊंचे डंडे में, सवा दो हाथ की लाल रंग की पताका लगानी चाहिए। बहुत-से लोग ध्वजा भी लगाते हैं। दरअसल पताका तीन कोनों वाली होती हैं और ध्वजा चार कोनों वाली होती हैं। आप इनमें से जो चाहें वो लगा सकते हैं।

ध्वजा या पताका लगाते समय सोम, दिगंबर कुमार और रूरु भैरव का ध्यान कर उनसे अपनी ध्वजा या पताका की रक्षा के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। उनसे अपने घर की सुख-समृद्धि के लिए भी प्रार्थना करनी चाहिए।  ऐसा करने से जहां एक तरफ व्यक्ति की जीत सुनिश्चित होती है। उसकी सुख-समृद्धि में बढ़ोत्तरी होती है तो वहीं दूसरी तरफ केतु के शुभ परिणाम भी प्राप्त होते हैं। घर का वास्तु भी पूरे साल भर तक दुरुस्त रहता है। 

गुड़ी पड़वा मनाने को लेकर कथाएं
दक्षिण भारत में गुड़ी पड़वा की लोकप्रियता का कारण इस पर्व से जुड़ी कथाओं से समझा जा सकता है। दक्षिण भारत का क्षेत्र रामायण काल में बालि का शासन क्षेत्र हुआ करता था। जब भगवान श्री राम माता को पता चला की लंकापति रावण माता सीता का हरण करके ले गये हैं तो उन्हें वापस लाने के लिये उन्हें रावण की सेना से युद्ध करने के लिये एक सेना की आवश्यकता थी। दक्षिण भारत में आने के बाद उनकी मुलाकात सुग्रीव से हुई। सुग्रीव ने बालि के कुशासन से उन्हें अवगत करवाते हुए अपनी असमर्थता जाहिर की। तब भगवान श्री राम ने बालि का वध कर दक्षिण भारत के लोगों को उनसे मुक्त करवाया। मान्यता है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का ही वो दिन था। इसी कारण इस दिन गुड़ी यानि विजय पताका फहराई जाती है।

एक और प्राचीन कथा शालिवाहन के साथ भी जुड़ी है कि उन्होंने मिट्टी की सेना बनाकर उनमें प्राण फूंक दिये और दुश्मनों को पराजित किया। इसी दिन शालिवाहन शक का आरंभ भी माना जाता है।

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गुड़ी पाड़वा को लेकर स्वास्थ्य लाभ
स्वास्थ्य के नज़रिए से भी इस पर्व का महत्व है। इसी कारण गुड़ी पड़वा के दिन बनाये जाने वाले व्यंजन खास तौर पर स्वास्थ्य वर्धक होते हैं। चाहे वह आंध्र प्रदेश में बांटा जाने वाला प्रसाद पच्चड़ी हो या फिर महाराष्ट्र में बनाई जाने वाली मीठी रोटी पूरन पोली हो। पच्चड़ी के बारे में कहा जाता है कि खाली पेट इसके सेवन से चर्म रोग दूर होने के साथ साथ मनुष्य का स्वास्थ्य बेहतर होता है। वहीं मीठी रोटी भी गुड़, नीम के फूल, इमली, आम आदि से बनाई जाती है।