बैसाखी त्योहार का इतिहास, बैसाखी के द‍िन ही गुरु गोव‍िंद सिंह ने द‍िए थे कुछ निर्देश, आइए जानते हैं इसका पूरा इतिहास

बैसाखी पर्व को लेकर जिस तरह पौराणिक महत्‍व है। उसी तरह ऐतिहासिक तथ्‍य भी हैं। जो काफी रोचक हैं। आइए जानते हैं….

सिक्‍खों से भी जुड़ा है इतिहास

ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार साल 1699 में सिक्‍खों के अंतिम गुरु, गुरु गोविंद सिंहजी ने एक द‍िन अपनी सभी सिक्‍खों को आंमत्रित किया और उनकी परीक्षा लेनी चाहिए। उन्‍होंने अपनी तलवार बाहर निकाली और अपने शिष्‍यों से कहा कि उन्‍हें एक स‍िर चाहिए। उनकी यह बात सुनकर सभी स्‍तब्‍ध रह गए। तभी एक शिष्‍य ने हामी भरी। गुरु गोविंद सिंह उसे अपने साथ लेकर अंदर गए। उसके कक्ष में जाते ही बाहर बैठे श‍िष्‍यों को अंदर से रक्‍त की धारा निकलती हुई दिखाई दी।

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तो पांच श‍िष्‍यों ने द‍िए अपने स‍िर

सारे श‍िष्‍य हैरान ही रह गए। गुरु का यह व्‍यवहार उनकी समझ से परे था। वह जब तक कुछ समझने का प्रयास करते कि गुरु फिर से बाहर आए। सब एकटक उनकी ओर देखने लगे कि तभी उन्‍होंने फिर से कहा कि मुझे एक सिर चाहिए। फिर से सारे श‍िष्‍य चुप लेकिन एक ने हामी भरी। गुरु गोविंद सिंहजी उसे भी अंदर लेकर गए। इसके बाद सबने फिर से वही दृश्‍य देखा। इसी तरह से गुरु गोविंद सिंह का सिर लेने का यह क्रम पांच शिष्‍यों तक चला। उसके बाद वह अंदर गए और अपने पांचों शिष्‍यों के साथ वापस निकले। यह देखकर सभी हैरान रह गए।

इसलिए जरूरी है कृपाण रखना 

कमरे से न‍िकलते रक्‍त को देखकर सभी शिष्‍यों ने इसका राज जानना चाहा तो गुरु गोविंद सिंह ने बताया कि अंदर उन्‍होंने पशुओं की बलि दी है। वह तो बस अपने शिष्‍यों की परीक्षा लेना चाहते थे और इस परीक्षा में वह सभी पास हुए। इसके बाद उन्‍होंने उन पांचों शिष्‍यों को अमृत का रसपान कराया और कहा कि अब वे सिंह कहलाएंगे। यही खालसा कहलाएं। साथ ही उन्‍हें कुछ निर्देशों का पालन करने के लिए भी कहा। इनमें बाल और दाढ़ी बड़ी रखने, बालों को संवारने के लिए साथ में कंघा रखने, कृपाण, कच्‍छा पहनने और हाथों में कड़ा पहनने की बात शामिल थी। इसके बाद गुरु गोविंद सिंह ने उन्‍हें कभी भी निर्बलों पर हाथ न उठाने का निर्देश दिया। तब से इस दिन को खुशी के पर्व यानी कि बैसाखी के रूप में मनाया जाने लगा।