दुनिया की पहली सर्जरी ऐसे हुई थी, गजब है कहानी

च‍िक‍ित्‍सकों नहीं देवताओं ने की थी सबसे पहले सर्जरी

विज्ञान की कई ऐसी खोज हैं, जिनके बारे में हिंदू धर्म ग्रंथों में तमाम पहले ही उल्‍लेख किया जा चुका है। इन्‍हीं में से एक है सर्जरी। पुराणों के अनुसार, दुनिया की सबसे पहली सर्जरी का श्रेय भी हिंदू धर्म के देवताओं को जाता है। आइए जानते हैं क‍ि वह कौन-कौन से देवता हैं जिन्‍होंने सर्जरी की थी और सबसे पहले क‍िसकी सर्जरी की गई थी?

भगवती के आदेश पर ऐसे हुई थी पहली सर्जरी

पौराणिक कथाओं के अनुसार, श्रीव‍िष्‍णु ने सबसे पहली सर्जरी की थी। इसकी कथा इस प्रकार है कि हयग्रीव नाम का एक पराक्रमी दैत्‍य हुआ। उसका बाकी का शरीर तो मनुष्‍यों जैसा था। लेकिन स‍िर घोड़े का था। उसने कठिन तपस्‍या करके देवी भगवती को प्रसन्‍न किया। इसपर देवी मां ने कहा क‍ि मैं प्रसन्‍न हूं तुम वर मांगों। तब हयग्रीव ने कहा कि मां मुझे अमर होने का वरदान दें। देवी भगवती ने कहा क‍ि संसार में जो भी जन्‍म लेता है उसकी मृत्‍यु न‍िश्‍च‍ित है। प्रकृति के इस व‍िधान से कोई नहीं बच सकता। इसलिए अमरत्‍व के अलावा कोई और वर मांगों। तब दैत्‍यराज ने कहा कि यद‍ि ऐसा है तो मुझे वरदान दें कि किसी हयग्रीव के हाथों ही मेरी मृत्‍यु हो। देवी भगवती ने तथास्‍तु कहकर अंतर्धान हो गईं।

कट गया श्रीहर‍ि का स‍िर दु:खी हुए देवी-देवता

कथा मिलती है कि ब्रह्मांड की आवधिक विघटन के प्रलय के ठीक पहले जब प्रजापति ब्रह्मा के मुंह से वेदों का ज्ञान निकल गया। तब असुर हयग्रीव उस ज्ञान को चुराकर निगल गया और फिर वह मुन‍ियों को परेशान करने लगा। यह समस्‍या लेकर ब्रह्माजी भगवान विष्‍णु के पास पहुंचे। तब वह योगन‍िद्रा में मग्‍न थे। उनके धनुष की डोरी चढ़ी हुई थी। तब उन्‍होंने एक वक्री नाम कीड़ा उत्‍पन्‍न किया। ब्रह्मा जी की प्रेरणा से उसने धनुष की प्रत्‍यंचा काट दी। इससे भगवान व‍िष्‍णु का मस्‍तक कटकर अदृश्‍य हो गया।

तो इस तरह हुई थी भगवान व‍िष्‍णु की सर्जरी

श्रीहर‍ि का स‍िर कटने से देवताओं के दु:ख की सीमा न रही। सभी ने देवी भगवती की उपासना की। तब वह प्रकट हुईं और उन्‍होंने ब्रह्मा जी से कहा क‍ि वे विष्णु के सिर-विहीन शरीर पर अश्व का सिर स्थापित कर दें। साथ ही उन्‍होंने कहा कि सिर लगने के बाद श्रीहर‍ि हयग्रीव भगवान कहलाएंगे और वह उस पापी असुर हयग्रीव का वध करके देवताओं का कल्‍याण करेंगे। यह सुनकर ब्रह्माजी ने तुरंत अपने फरसे से घोड़े का सिर काट कर विष्णुजी के शरीर पर लगा दिया। तब श्रीहर‍ि भगवती की कृपा से घोड़े के मुख वाले ( हयग्रीव ) बन गये। इसके कुछ द‍िनों बाद ही भगवान हयग्रीव ने उस शत्रु, अहंकारी दानव का अपनी शक्ति द्वारा वध कर दिया। पौराण‍िक कथाओं के अनुसार यह दुनिया की पहली सर्जरी मानी जाती है।

ससुरजी के कटे सिर की सर्जरी की थी शिवजी ने

पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा दक्ष प्रजापति ने एक बार यज्ञ का आयोजन किया था। इसमें सभी देवताओं को आमंत्रित किया था लेकिन शिव जी को निमंत्रण नहीं भेजा था। माता सती को जब पता चला कि उनके पिता के घर पर यज्ञ है तो वह बिना निमंत्रण पत्र के लिए अपने मायके जाने को तैयार हुईं। शिव जी के लाख समझाने पर भी वह नहीं मानीं और मायके से निमंत्रण पत्रिका की जरूरत नहीं होती यह तर्क देकर वह चली गईं। माता सती जब पहुंची तो वहां किसी ने भी उनका सम्‍मान नहीं किया। न ही भगवान शिव के बारे में पूछा। इस अपमान को वह बर्दाश्‍त नहीं कर सकीं। उन्‍होंने यज्ञ में आत्‍मदाह कर लिया।

वीरभद्र ने काट द‍िया दक्ष प्रजापति का स‍िर

इसकी खबर मिलते ही शिव जी अत्‍यंत क्रोधित हो गए। उन्‍होंने अपने बाल से वीरभद्र को जन्‍म दिया। वीरभद्र की तीन आंखें थीं जो कि अग्नि के समान ज्‍वलंत थीं। इसके अलावा उसने मुंडों की माला के साथ बहुत सारे हथियार धारण किये हुए थे। उसके पहुंचते ही यज्ञमंडप में खलबली मच गई। देवता उठकर खड़े हो गए। वीरभद्र ने संपूर्ण यज्ञ का व‍िध्‍वंस कर द‍िया। यज्ञमंडप में भगदड़ मच गई। देवता और ॠषि-मुनि भाग खड़े हुए। वीरभद्र ने देखते ही देखते दक्ष का मस्तक काटकर फेंक दिया। तब वहां शिव ने सती का शव जलते हुए यज्ञ से निकाला और उसे लेकर वे चल दिए। जहां-जहां सती के शव के टुकड़े, वस्त्र, आभूषण गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ निर्मित हो गए। बाद में देवताओं की प्रार्थना पर संतुष्ट होकर भगवान शंकर ने अपने गण को बकरे का स‍िर लाने को कहा और उसे ही प्रजापति के धड़ पर लगा द‍िया। प्रजपति ने शिव की स्तुति की। बकरे के रूप में बोलते प्रजापति के स्वर को सुनकर महादेव प्रसन्न हो गए उस समय से ही भगवान शिव की पूजा में दोनों गालों पर अंगूठे और मध्यमा उंगली से दबाकर बकड़े जैसी आवाज निकलाने की विधि शुरू हो गई।

देवी पार्वती के क्रोध के आगे हार गए जब श‍िव

कथा मिलती है माता पार्वती की। उन्‍होंने चंदन से भगवान श्रीगणेश को बनाया। इसके बाद वह स्‍नान के लिए जाने लगीं तब उन्‍होंने गणेश जी को यह आदेश दिया कि वह दरवाजे पर ही रहें और किसी को भी भीतर प्रवेश न दें। इसके बाद वह स्‍नान के लिए चली गईं। तभी भगवान शिव वापस लौटे और भीतर प्रवेश करने लगे। गणेश जी ने उन्हें अंदर जाने से मना कर दिया। उन्‍होंने कहा कि माता का आदेश है कि कोई भी अंदर प्रवेश न करें। भगवान शिव ने बहुत प्रयास किया। लेकिन गणेश जी नहीं मानें और क्रोधित होकर भोलेनाथ ने भगवान गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया। यह दृश्‍य देखते ही माता पार्वती अत्‍यंत क्रोधित हो गईं और वह संपूर्ण सृष्टि का विनाश करने निकल पड़ीं।

भगवान श‍िव ने ऐसी ही एक और सर्जरी भी की

इसके बाद भगवान ब्रह्मा ने माता को क्रोध शांत करने का निवेदन किया। तब मां ने उन्‍हें गणेश जी को पुर्नजीवित करने और देवताओं में प्रथम पूजने की बात रखी। इस बात को स्‍वीकारते हुए ब्रह्मदेव ने भोलेनाथ से कहा कि इस सृष्टि में जो भी पहला ऐसा व्‍यक्ति दिखे जो उत्‍तर दिशा की तरफ सिर करके बैठा हो वह उसका सिर लेकर आएं और गणेश जी को वह प्रत्‍योरोपित कर दिया जाएगा। इसी खोज में निकले शिव जी को संपूर्ण सृष्टि में केवल एक हाथी ही ऐसा दिखा जो कि ब्रह्मदेव के मुताबिक उत्‍तर दिशा में सिर करके बैठा था। इसके बाद शिव जी ने हाथी के सिर को भगवान गणेश जी के धड़ पर प्रत्‍यारोपित किया। हालांकि चिकित्‍साशास्‍त्र में अभी इस विषय पर शोध जारी है।