केदारनाथ के कपाट खुल रहें हैं 29 अप्रैल को, आइए जानते हैं केदारनाथ के 8 बड़े रहस्‍य

केदारनाथ धाम से जुड़ी ही रोचक बातें उत्‍तराखंड के चार धामों में से एक केदारनाथ मंदिर के कपाट खोलने में लॉकडाउन के चलते विलंब हुआ है और अब ये कपाट 29 अप्रैल को खोले जाएंगे। वैसे हर साल मंदिर के कपाट अक्षय तृतीया के अगले दिन खोल दिए जाते हैं, लेकिन इस साल लॉकडाउन चलते इसमें थोड़ी देरी की जा रही है। हालांकि गंगोत्री और यमुनोत्री के कपाट तय समय के अनुसार सोमवार को खोल दिए गए हैं। हिमालय पर्वतमाला की गोद में स्थित भगवान शिव की भक्ति का यह धाम खूबसूरत प्राकृतिक अलौकिक दृश्‍यों के साथ-साथ तमाम पौराणिक कथाओं को समेटे हुए है। आज हम आपको बताने जा रहे हैं केदारनाथ धाम से जुड़ी ऐसी ही रोचक बातें…

यह भी पढ़े: केदारनाथ की पूजा से पहले होती है इनकी पूजा, गजब रहस्य

सदैव प्रज्‍जवलित रहता है यह दीप

कपाट को बंद करते समय मंदिर में एक दीप प्रज्‍जवलित कर दिया जाता है और फिर 6 महीने के बाद जब मंदिर के कपाट खोले जाते हैं तो तक तक भी यह दीप जला हुआ मिलता है। मान्‍यता है कि इस 6 महीने के वक्‍त में देवतागण आकर अपने आराध्‍य देव भगवान शिव की पूजा करते हैं और इस दीपक को जलाकर रखते हैं। कपाट खुलने पर इस प्रज्‍जवलित दीप के दर्शन करना बहुत ही पुण्‍यदायी माना जाता है।

भगवान शिव का दूसरा निवास स्‍थान, दिलाता है मोक्ष

कैलाश पर्वत के बाद केदारनाथ को भगवान शिव का दूसरा निवास स्‍थान माना जाता है। पौराणिक कथाओं में इसके महत्‍व के बारे में विस्‍तृत रूप में बताया गया है। इससे पता चलता है कि यह भगवान शिव का दूसरा निवास स्‍थान है। शिवपुराण में भी इसकी महिमा के बारे में बताया गया है कि यहां मृत्‍यु को प्राप्‍त करने वाले भक्‍तों के लिए सीधे मोक्ष के द्वार खुलते हैं और उन्‍हें शिवलोक में स्‍थान मिलता है।

द्वापर योग में पांडवों ने खोजा था केदारनाथ

पौराणिक कथाओं में इस बारे में बताया गया है कि भगवान शिव के द्वादश ज्‍योर्तिलिंगों में से केदारनाथ की खोज सबसे पहले पांडवों ने की थी। माना जाता है कि वे अपने पापों से मुक्ति पाने के लिए भोलेबाबा को ढूंढ़ते हुए केदारनाथ तक आ पहुंची थीं। वांडवों के वंशज जनमेजय ने यहां केदारनाथ मंदिर में नींव रखी थी। उसके बाद आठवीं सदी में आदिगुरु शंकराचार्य ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। उसके बाद यहां आदिकाल से भगवान शिव की आराधना होती आ रही है।

इसलिए बैल की पीठ समान है शिवलिंग

माना जाता है कि भोलबाबा ने पांडवों को यहां पर बैल के रूप में दर्शन दिए थे। उसके बाद पांडवों ने उनसे वहीं शिवलिंग के रूप में बस जाने की विनती की तो भोलेबाबा वहां भू-शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए और बैल की पीठ के आकार के शिवलिंग के रूप में स्‍थापित हो गए।

मंदिर में पांडवों की भी मूर्ति

मंदिर के गर्भ गृह के बाहर पांच पांडवों के साथ द्रौपदी की मूर्ति की भी स्‍थापित की गई है। इस मंदिर का निर्माण कत्‍युरी शैली में हुआ है। माना जाता है कि केदारनाथ की यात्रा के बिना बदरीनाथ की यात्रा करना अधूरा माना जाता है। इसके दर्शन के बना चारधाम की यात्रा अधूरी मानी जाती है।

इस तरह भगवान शिव बन गए ‘केदारनाथ’

केदारनाथ आखिर केदारनाथ क्यों कहलाते हैं इसके पीछे एक अलग कहानी है। केदारखंड की कथा के अनुसार नर-नारायण की प्रार्थना पर भगवान शिव ने केदरखंड में निवास करने का वरदान दिया। उस समय यहां केदार नामक धर्मप्रिय राजा शासन करते थे। राजा केदार के नाम पर यह क्षेत्र केदारखंड कहलाता था। राजा केदार भी भगवान शिव के भक्त थे। राजा की प्रार्थना पर भगवान शिव ने केदारखंड का रक्षक बनना स्वीकार किया और भगवान शिव कहलाने लगे केदारनाथ।

यह भी पढ़े: प्‍यार को शादी के मुकाम तक ही पहुंचाकर मानते हैं इन 5 राशियों के लोग

स्‍कंदपुराण में यह कथा

pashupatinath kedarnath
pashupatinath kedarnath

केदारनाथ को लेकर स्‍कंद पुराण में भी इस कथा का जि‍क्र मिलता है। इसके अनुसार असुरों से दुखी होकर देवताओं ने यहां भगवान शिव की आराधना की जिससे भगवान शिव बैल रूप में प्रकट हुए और पूछा ‘के-दरयामि’ यानी किसे चीरूं किसे फाड़ू। इसके बाद भगवान शिव ने असुरों को अपने सिंगों और खुरों से मार-मारकर मंदाकिनी में फेंकना शुरू किया। ‘के-दरयामि’ शब्द से ही यह स्थान केदारनाथ कहलाया।

इस शिला ने की मंदिर की रक्षा

वर्ष 2013 में यहां आई भीषण बाढ़ ने आस-पास के पूरे इलाके को तबाह कर दिया। यहां के कई मंदिर नष्‍ट हो गए। यहां की पूरी तस्‍वीर ही बदल गई, लेकिन क्‍या वज‍ह थी कि मंदिर का बाल भी बांका न हो सका। मंदिर के किनारे पर स्थित एक शिलाखंड ने मंदिर को बचा लिया। तब से यहां की आस्‍था में एक नया अध्‍याय जुड़ गया और भक्‍त इस पत्‍थर को देव शिला मानने लगे।

हरिद्वार से शुरू होती है केदारनाथ की यात्रा

असली मायने में केदारनाथ की यात्रा हरिद्वार या ऋषिकेश से आरंभ होती है। हरिद्वार से सोनप्रयाग 235 किलोमाटर और सोनप्रयाग से गौरीकुंड 5 किलोमाटर आप सड़क मार्ग से किसी भी प्रकार की गाड़ी से जा सकते है। इससे आगे का 16 किलोमाटर का रास्ता आपको पैदल ही चलना होगा या आप पालकी या घोड़े से भी जा सकते हैं।

यह भी पढ़े: चारधाम यात्रा शुरू, खुले गंगोत्री और यमुनोत्री के कपाट

गौरीकुंड से शुरू कर दें चढ़ाई

गुप्‍तकाशी पहुंचने के बाद रात में यहीं रुकें। उसके बाद अपना सामान होटल में लॉक करवाकर यहां से सुबह जल्‍द ही 6 बजे निकल जाएं और 8 बजे तक गौरीकुंड से चढ़ाई प्रारंभ कर दें। शाम तक केदारनाथ पहुंचे दर्शन करे और रात में केदारनाथ में रुकें। यदि चाहे तो सुबह फिर से दर्शन करे और फिर वापस गौरीकुंड आ जाएं और फिर गौरीकुंड से गुप्तकाशी आकर रात में रुकें।