ज्योतिर्लिंग नहीं फिर भी बहुत प्रसिद्ध है यह शिवलिंग, ऐसी है यहां की मान्यता

जल्द ही भगवान शंकर का विशेष त्योहार महाशिवरात्रि आने वाला है वैसे तो महादेव के कई तीर्थस्थल हैं लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक ऐसा तीर्थस्थल भी है जो भगवान शिव की तपोस्थली के रूप में जानी जाती है। जी हां, देवनगरी के नाम से प्रसिद्ध उत्तराखंड में एक धार्मिक स्थल है जिसका नाम जागेश्वर धाम है। खास बात यह है कि इन तीर्थस्थलों का उल्लेख हमारे पुराणों और ग्रंथों में भी मिलता है। मान्यतानुसार, यहां भगवान शिव का प्रथम ज्योतिर्लिंग जागेश्वर स्थित है। जागेश्वर को उत्तराखंड का पांचवां धाम भी कहा जाता है। हालांकि इसको लेकर यह भी कहा जाता है कि यह भगवान शंकर के 12 ज्योतिर्लिंग में से एक है तो आइए जानते हैं कि क्या है इस पावन धर्मस्थली की गाथा और क्या इस मंदिर की मान्यता?

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इस तरह पड़ा जागेश्वर नाम हिमालय पर्वतमाला पर अल्मोड़ा नगर से पूर्वोत्तर दिशा में पिथौरागढ़ मार्ग पर 36 किमी की दूरी पर पवित्र जागेश्वर धाम स्थित है। जागेश्वर की तल से ऊंचाई 1870 मीटर है। जागेश्वर धाम के बारे में मान्यता है कि यह प्रथम मंदिर है जहां लिंग के रूप में शिवपूजन की परंपरा सबसे पहले आरंभ हुई। कई पुराणों में इस जगह का उल्लेख मिलता है, इस पावनस्थली के बारे में एक श्लोक है

मा वैद्यनाथ मनुषा व्रजंतु, काशीपुरी शंकर बल्ल्भावां।

मायानगयां मनुजा न यान्तु, जागीश्वराख्यं तू हरं व्रजन्तु। 

अर्थात मनुष्य वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग न जा पाए, शंकर प्रिय काशी, मायानगरी (हरिद्वार) भी न जा सके तो जागेश्वर धाम में भगवान शिव के दर्शन जरूर करना चाहिए। मान्यता है कि सुर, नर, मुनि से सेवित हो भगवान भोलेनाथ यहां जागृत हुए थे इसलिए इस जगह का नाम जागेश्वर पड़ा।

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नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के स्थान पर है संशय मंदिर प्रशासन के अनुसार यह ज्योतिर्लिंग 12 ज्योतिर्लिंग में से 8वां ज्योतिर्लिंग है लेकिन नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के स्थान को लेकर लोग एकमत नहीं है क्योंकि नागेश नामक ज्योतिर्लिंग जो गुजरात के बड़ौदा क्षेत्र में गोमती द्वारका के समीप है कुछ लोग इसे 12 ज्योतिर्लिंग में से एक मानते हैं तो कुछ लोग दक्षिण हैदराबाद के औढ़ा ग्राम में स्थित शिवलिंग का नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मानते हैं और कुछ लोग मानते हैं कि यह ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के हिंगोली जिले में स्थित औंढ़ा नागनाथ नामक जगह पर है, वहीं अन्य लोगों का मानना है कि यह ज्योतिर्लिंग उत्तराखंड राज्य के अल्मोड़ा के समीप जागेश्वर नामक जगह पर स्थित है। जागेश्वर धाम योगेश्वर ज्योतिर्लिंग नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि जागेश्वर का प्राचीन मृत्युंजय मंदिर धरती पर स्थित बारह ज्योतिर्लिंगों का उद्गम स्थल है।

यह है जागेश्वर धाम का मुख्य मंदिर ऐसी मान्यता है कि देवाधिदेव महादेव यहां आज भी वृक्ष के रूप में मां पार्वती सहित विराजते हैं। देवदार के घने वृक्षों से घिरी यह घाटी एक मनोहारी तीर्थस्थल है। मान्यता है कि भगवान शिव-पार्वती के युगल रूप के दर्शन यहां आने वाले श्रद्धालु मंदिर परिसर में स्थित नीचे से एक और ऊपर से दो शाखाओं वाले विशाल देवदार के वृक्ष में करते हैं। यह बहुत प्राचीन पेड़ बताया जाता है। यह भी सत्य है कि भगवान शिव ही एकमात्र देवता हैं, जिन्होंने सदैव मृत्यु पर विजय पाई। मृत्यु ने कभी भी शिव को पराजित नहीं किया। इसी कारण उन्हें मृत्युंजय के नाम से पुकारा गया।

पुराणों में मिलता है जागेश्वर के मंदिरों का उल्लेख जागेश्वर धाम के मंदिर समूह में सबसे विशाल एवं सुंदर मंदिर महामृत्युंजय महादेव जी के नाम से विख्यात है। जागेश्वर में लगभग 250 छोटे-बड़े मंदिर हैं। जागेश्वर धाम के इस मंदिर में 124 मंदिरों का एक समूह है, जो अति प्राचीन है। इसके 4-5 मंदिरों में रोज पूजा-अर्चना होती है। सबसे विशाल तथा प्राचीनतम महामृत्युंजय शिव मंदिर यहां का मुख्य मंदिर है इसके अलावा जागेश्वर धाम में भैरव, माता पार्वती,केदारनाथ, हनुमान, मृत्युंजय महादेव, माता दुर्गा के मंदिर भी विद्यमान है। इनमें 108 मंदिर भगवान शिव जबकि 16 मंदिर अन्य देवी-देवताओं को समर्पित हैं। महामृत्युंजय, जागनाथ, पुष्टि देवी व कुबेर के मंदिरों को मुख्य मंदिर माना जाता है। स्कंद पुराण, लिंग पुराण मार्कण्डेय आदि पुराणों ने जागेश्वर की महिमा का बखूबी बखान किया है। 

प्रथम शिवलिंग के रूप में है जागेश्वर धाम की मान्यता यहां स्थित नागेश्वर शिवलिंग भगवान शिव के प्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रसिद्ध है। ऐसा कहा जाता है कि प्राचीन समय में जागेश्वर मंदिर में मांगी गई मन्नतें हमेशा स्वीकार हो जाती थी, जिसका भारी दुरुपयोग होने लगा। 8वीं सदी में आदि शंकराचार्य यहां आए और उन्होंने इस दुरुपयोग को रोकने की व्यवस्था की। ऐसा माना जाता है कि किसी के लिए मांगी गई बुरी कामना यहां कभी पूरी नहीं होती है। यहां सिर्फ यज्ञ एवं अनुष्ठान से मंगलकारी मनोकामनाएं ही पूरी हो सकती हैं।

कैसे हुआ जागेश्वर के मंदिरों का निर्माण यह भी मान्यता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के पुत्रों लव-कुश ने अपने पिता की सेना से युद्ध किया था, राजा बनने के बाद वे यहां आए थे। दरअसल लव-कुश अज्ञानतावश किए युद्ध के प्रायश्चित के लिए इस जगह पर ही यज्ञ आयोजित किया था, जिसके लिए उन्होंने देवताओं को आमंत्रित किया था। कहा जाता है कि लव-कुश ने ही सर्वप्रथम इन मंदिरों की स्थापना की थी। वह यज्ञ कुंड आज भी यहां विद्यमान है। रावण, पांडव और मार्कण्डेय ऋषि द्वारा जागेश्वर धाम में शिव पूजन का उल्लेख मिलता है। यहां पांडवों के आश्रय होने के आज भी अनेक मूक साक्ष्य मिलते हैं। हालांकि मंदिर का निर्माण किसने किया इसके बारे में साक्ष्य प्रमाण नहीं मिल पाए हैं।

इस समयकाल में बने जागेश्वर धाम के मंदिर जागेश्वर धाम को कोई 1 हजार तो कोई 2 हजार साल पुराना बताता है। लिखित साक्ष्य न होने से भारतीय इतिहास प्रामाणिकता से ज्यादा यह मंदिर अटकलों का शिकार है। मंदिर की दीवारों पर ब्राह्मी और संस्कृत में लिखे शिलालेखों से इसकी निश्चित निर्माणकाल के बारे पता नहीं चलता है। हालांकि पुरातत्वविदों के अनुसार मंदिरों का निर्माण 7वीं से 14वीं सदी में हुआ था। इस काल को पूर्व कत्यूरी काल, उत्तर कत्यूरी व चंद तीन कालों में बांटा गया है।

इन राजाओं ने कराया था जीर्णोद्धार जागेश्वर के इन मंदिरों का जीर्णोद्धार राजा शालिवाहन ने अपने शासनकाल में कराया था। पौराणिक काल में भारत में कौशल, मिथिला, पांचाल, मस्त्य, मगध, अंग एवं बंग नामक अनेक राज्यों का उल्लेख मिलता है। कुमाऊं कौशल राज्य का एक भाग था। माधवसेन नामक सेनवंशी राजा देवों के शासनकाल में जागेश्वर आया था। चंद्र राजाओं की जागेश्वर के प्रति अटल श्रद्धा थी। देवचंद्र से लेकर बाजबहादुर चंद्र तक ने जागेश्वर की पूजा-अर्चना की। बौद्ध काल में भगवान बद्री नारायण की मूर्ति गौरी कुंड और जागेश्वर की देव मूर्तियां ब्रह्मकुंड में कुछ दिनों पड़ी रहीं। जगतगुरु आदि शंकराचार्य ने इन मूर्तियों की पुनर्स्थापना की।

उच्च वास्तुकला से बने हैं जागेश्वर धाम के मंदिर जागेश्वर धाम में सारे मंदिर केदारनाथ शैली यानी नागर शैली से बने हुए हैं। अपनी वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध इस मंदिर को भगवान शिव की तपस्थली के रूप में भी जाना जाता है। स्थानीय लोगों के विश्वास के आधार पर इस मंदिर के शिवलिंग को नागेश लिंग घोषित किया गया।  इस मंदिर के किनारे एक पतली सी नदी की धारा भी बहती है। यह एक मनोहारी तीर्थस्थल और यहां की खूबसूरती वाकई देखने वाली है। हर वर्ष यहां सावन के महीने में श्रावणी मेला लगता है। देश ही विदेश से भी यहां भक्त आकर भगवान शंकर का रूद्राभिषेक करते हैं। यहां रूद्राभिषेक के अलावा, पार्थिव पूजा, कालसृप योग की पूजा, महामृत्युंजय जाप जैसे पूजन किए जाते हैं। महाशिवरात्रि पर भी यहां विशेष आयोजन किए जाते हैं और इस अवसर पर यहां पर भारी संख्या में श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं।

जागेश्वर धाम से जुड़ी पौराणिक कथा एक पौराणिक कथा के अनुसार, दक्ष प्रजापति के यज्ञ में माता सती के आत्मदाह से दुखी भगवान शिव ने यज्ञ की भस्म लपेट कर दारुक वन के घने जंगलों में लंबे समय तक तप किया। इसलिए यह जगह शिव की तपस्थली के रूप में जानी जाती है। इन्हीं जंगलों में वशिष्ठ आदि सप्त ॠषि अपनी पत्नियों सहित कुटिया बनाकर तप करते थे। एक बार भगवान शिव दिगंबर अवस्था में ध्यान में लीन थे उस दौरान एक दिन इन सप्त ॠषियों की पत्नियां जंगल में कंदमूल, फल एवं लकड़ी आदि के लिए गई थीं तो उनकी नजर दिगंबर शिव पर पड़ी। भगवान शिव के सुगठित शरीर को देखकर ॠषियों की पत्नियां शंकर भगवान पर मोहित हो गई। शंकर भगवान अपनी तपस्या में रम थे, उन्होंने उनकी ओर ध्यान नहीं दिया फिर ॠषियों की पत्नियां कामस्वरूप में अंधी होकर वहीं मूर्छित हो कर गिर गईं। जब वे सब पूरी रात कुटियों में वापस नहीं आई तो सुबह ॠषिगण उन्हें ढूंढने निकले।

सप्तऋषियों ने दिया भगवान शंकर को शाप तब सप्तऋषियों ने देखा कि शिव समाधि में लीन हैं और उनकी पत्नियां मूर्छित पड़ी हैं तो उन्हें लगा कि भगवान शिव ने उनकी पत्नियों के साथ व्याभिचार किया है और इस आशंका में वे भगवान शंकर को शाप दे बैठे और बोले कि ‘तुमने हमारी पत्नियों के साथ व्याभिचार किया है, अत: तुम्हारा लिंग तुरंत तुम्हारे शरीर से अलग होकर गिर जाए।’ भगवान शिव नेत्र खोलते हुए बोले कि ‘आप लोगों ने मुझे संदेहजनक परिस्थितियों में देखकर अज्ञानता के कारण ऐसा किया है, इसलिए मैं इस शाप का विरोध नहीं करूंगा। मेरा लिंग स्वत: गिरकर इस स्थान पर स्थापित हो जाएगा। तुम सभी सप्त ॠषि भी आकाश में तारों के साथ अनंत काल तक लटके रहोगे।’ लिंग के शिव से अलग होते ही पूरे संसार में कोहराम मचने लगा। ब्रह्मदेव ने संसार को इसके प्रकोप से बचाने के लिए ॠषियों को मां पार्वती की उपासना करने के लिए कहा। ब्रह्मदेव जानते थे कि शिव के इस तेज को पार्वती ही धारण कर सकती हैं। ॠषियों ने मां पार्वती की उपासना की, पार्वती ने योनि रूप में प्रकट होकर शिवलिंग को धारण किया। इस शिवलिंग को योगेश्वर शिवलिंग के नाम से पुकारा गया।