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भगवान शिव के त्रिशूल, डमरू, नाग, नंदी, त्रिपुंड किसके प्रतीक हैं और उन्हें कैसे प्राप्त हुए?

त्र‌िशूल- भगवान शिव को त्र‌िशूल कैसे मिला इस व‌िषय में कोई कथा नहीं है. मान्यता है कि सृष्ट‌ि के आरंभ में जब ब्रह्मनाद से भगवान श‌िव प्रकट हुए तो उनके साथ रज, तम, सत यह तीनों गुण भी प्रकट हुए. यही तीनों गुण श‌िव जी के तीन शूल यानी त्र‌िशूल बने. इनके बीच सांमजस्य बनाए बिना सृष्ट‌ि का संचालन संभव नहीं था. इसल‌िए श‌िव ने त्र‌िशूल रूप में इन तीनों गुणों को अपने हाथों में धारण क‌िया.

डमरू- जिस समय भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और नृत्य करते हैं उस समय उनके हाथों में डमरू होता है. इसका आकार रेत की घड़ी जैसा है जो द‌िन रात और समय के संतुलन का प्रतीक माना जाता है. भगवान शिव का स्वभाव भी इसी तरह का है. इनका एक स्वरूप वैरागी का है तो दूसरा भोगी का है जो नृत्य करता है पर‌िवार के साथ जीता है.

नाग- भगवान श‌िव के गले में जो नाग है उसका नाम वासुकी है. पुराणों में बताया है क‌ि यह नागों के राजा हैं और नागलोक पर इनका शासन है. सागर मंथन के समय वासुकी ने ही रस्सी का काम किया था. कहा जाता है कि वासुकी भगवान श‌िव के परम भक्त थे. जिससे प्रसन्न होकर भगवान श‌िव ने इन्हें अपने गले में आभूषण की तरह ल‌िपटे रहने का वरदान द‌िया.

त्रिपुंड- श‌िव जी के माथे पर भभूत से 3 रेखाएं बनीं हैं. ऐसी मान्यता है कि यह तीनों लोकों का प्रतीक है. इसे रज, तम और सत गुणों का भी प्रतीक माना जाता है. पुराणों में उल्लेख है कि दक्ष प्रजपत‌ि के यज्ञ कुंड में सती के आत्मदाह करने के बाद श‌िव जी उग्र रूप धारण करते हैं और माता सती की देह को कंधे पर लेकर त्र‌िलोक में हाहाकार मचाने लगते हैं. तब भगवान व‌िष्‍णु सती की देह को खंड‌ित कर देते हैं. जिसके बाद श‌िव जी अपने माथे पर हवन कुंड की राख मलते और इस तरह सती की याद को त्र‌िपुंड रूप में माथे पर स्‍थान देते हैं.

नंदी- पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव और नंदी एक ही हैं. भगवान श‌िव ने ही नंदी के रूप में जन्म ल‌िया. कथा है क‌ि श‌िलाद नाम के ऋष‌ि मोह माया से मुक्त होकर तपस्या में लीन हो गए. उनके पूर्वजों को चिंता हुई कि ऐसा करने से उनका वंश नष्ट हो जाएगा. पूर्वजों की सलाह पर श‌िलाद ने श‌िव जी की तपस्या करके एक अमर पुत्र को प्राप्त क‌िया जो नंदी नाम से जाना गया. अन्य खबरों के लिए इस लिंक पर क्लिक करें

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