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कौन हैं मटुआ, क्यों यह समुदाय बंगाल चुनाव में वोटबैंक राजनीति का केंद्र है?

पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र वही मटुआ समुदाय (Matua Community) फिर प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के एजेंडे में आ गया है, जो दो साल पहले लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Elections) के दौरान आया था. आपको याद हो तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने उस समय अपना बंगाल का चुनावी अभियान 100 वर्षीय बोरो मां बीणापाणि देवी (Boro Maa Binapani Devi) का आशीर्वाद लेकर शुरू किया था. बोरो मां के परिवार का मटुआ समुदाय पर होल्ड माना जाता है. इसी के चलते बीजेपी ने तब इसी परिवार के शांतनु ठाकुर (Shantanu Thakur) को टिकट दिया था, जो कामयाब कदम साबित हुआ.

इस समुदाय का इतिहास 200 साल से भी ज़्यादा पुराना है, जिब हरिचंद ठाकुर ने इसकी स्थापना की थी. तबसे ही इस समुदाय का राजनीति के साथ चोली दामन का साथ रहा. आज़ादी के बाद प्रमथ रंजन ठाकुर का नाम रहा हो या उनकी मौत के बाद उनकी पत्नी बीणापाणि देवी का या अब उनके बेटों और पोतों का, इस परिवार और समुदाय के चेहरे बंगाल की राजनीति में हमेशा अहम रहे हैं.

क्या है विधानसभा चुनाव के लिए गणित?

चुनाव आते ही अन्य राज्यों की तरह पश्चिम बंगाल में जातिवाद की लहर उठने लगती है. जाति आधारित वोट बैंक की राजनीति में बंगाल में सबसे खास मटुआ समुदाय है, जो अनुसूचित जाति है और राज्य में इसकी आबादी 3 करोड़ से ज़्यादा है. इस समुदाय का प्रभाव 70 विधानसभा सीटों पर माना जाता है, जो नॉर्थ 24 परगना, साउथ 24 परगना, नाडिया, मालदा व अन्य छोटे इलाकों के बीच बंटी हुई हैं.

इस समुदाय के वोट बैंक के गणित का आप ऐसे भी समझ सकते हैं कि राज्य की 42 संसदीय सीटों में से 10 अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं. इनमें से 4 सीटें 2019 में बीजेपी ने जीती थीं और वो भी सिर्फ एक मुद्दे पर कि पार्टी इस समुदाय के हित में नागरिकता संशोधन कानून बनाएगी. जी हां, यह वही समुदाय है, जो इस कानून का बड़ा कारण रहा है.

वो समुदाय, जिसके लिए बना सीएए कानून

बंगाल में नामशूद्र समुदाय में शुमार रहे मटुआ समुदाय को राज्य में अब भी कहीं ‘चांडाल’ नाम से पुकारा जाता है, जो पुराने समय की परंपरा से जुड़ा शब्द रहा. 19वीं सदी में इस समुदाय के सामाजिक विकास का अभियान शुरू हुआ था, जिसके चलते आज़ादी के बाद इसकी स्थिति काफी बेहतर हुई.

विभाजन के बाद से जातीय गणित इस तरह का रहा कि मटुआ समुदाय को बंगाल में रिफ्यूजी माना गया जबकि इसकी इतनी बड़ी आबादी रही. यही नहीं, इस आबादी का 99.96% हिस्सा हिंदू समुदाय ही बताया जाता है. इस गणित से जब धर्म और जाति आधारित राजनीति के समीकरण तैयार हुए तो भाजपा ने बंगाल में इसे अपने आधार के तौर पर देखा.

रिफ्यूजी वाले तानों से परेशान इस समुदाय की लंबे समय से मांग नागरिकता रही और भाजपा ने नागरिकता संशोधन एक्ट बनाकर मटुआ समुदाय के बीच अपनी पकड़ बनाने की कोशिश की, जो वोटबैंक के लिहाज़ से काफी अहम कदम माना जाता है. यह अस्ल में भाजपा का भूल सुधार कदम भी बताया जाता है क्योंकि एनआरसी ने बंगाल में रिफ्यूजियों के मन में तरह तरह के डर पैदा कर दिए थे,​ जिन्हें सीएए के ज़रिये मिटाने की कोशिश की गई.

तो क्या है ममता की पॉलिटिक्स?

एक तरफ भाजपा ने सीएए के दांव से इस समुदाय को जीतने की चाल खेली तो दूसरी तरफ, पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी ने अव्वल तो असम में एनआरसी के खतरे को मुद्दा बनाकर इस समुदाय के लिए इस तरह के कदमों को खतरनाक बताते हुए चुनावी भाषण दिए. दूसरी तरफ, ममता ने ठोस कदम उठाते हुए भूमि अधिकारों की बात की.

ममता सरकार ने मटुआ समेत रिफ्यूजियों के भूमि अधिकारों की वकालत करते हुए उन्हें कुदरती नागरिक कहा और राज्य में सवा लाख पट्टे देने जैसे दांव खेले. यही नहीं, ममता के संबंध बोरो मां के साथ काफी पुराने और गहरे बताए जाते हैं. बोरो मां ने ममता को मटुआ महासंघ का प्रमुख संरक्षक भी बनाया था.

ममता बनर्जी 2009 से ही इस महासंघ के ठाकुरनगर से जुड़ी रहीं, लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद भी कई दौरे कर चुकी हैं. हर बार वो कुछ न कुछ सौगात इस समुदाय को देती रही हैं. जैसे मटुआ के संस्थापक हरिचंद ठाकुद के नाम पर यूनिवर्सिटी, मटुआ डेवलपमेंट बोर्ड बनाने जैसे ममता के कदम राज्य में वोटबैंक साधने के अहम टूल माने जाते हैं. यह भी गौरतलब है कि 2018 में बोरो मां को बंगाल के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘बंग बिभूषण’ से सम्मानित भी किया जा चुका है. अन्य खबरों के लिए इस लिंक पर क्लिक करें.

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