जानते है क्या राज छुपा है भगवान की इन चमकती आंखें में…

भारतीय सभ्‍यता और पंरपरा को जितना जाना जाए उतनी ही नई चीजें सामने आती हैं। कई बार तो इन्‍हें सुनकर, देखकर या पढ़कर हैरानी होती है। लेकिन यह उतने ही सच होते हैं। इसलिए महज इसे आश्‍चर्य या फिर आस्‍था का विषय ही माना जा सकता है। यूं तो ऐसे अचरजों का खजाना है भारत देश। लेकिन हम यहां बात कर रहे हैं राजस्‍थान के माउंट आबू स्थित मंदिरों के समूह की। जहां पर आपको देवता की चमकती आंखें देखकर हैरानी होगी। यही नहीं मंदिर में स्‍थापित देवता की पंचधातु प्रतिमा भी एक-दो नहीं बल्कि 4 हजार किलो की है। आइए जानते हैं कौन से हैं ये मंदिर और क्‍या-क्‍या है इनमें खास?

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पांच मंदिरों का है यह अद्भुत मंदिर

राजस्‍थान के माउंट आबू में स्थित पांच मंदिरों का समूह दिलवाड़ा मंदिर बेहद अद्भुत है। 11वीं और 13वीं शताब्‍दी के दौरान बनवाया गया यह मंदिर जैन धर्म के तीर्थंकरों को समर्पित है। दिलवाड़ा के मंदिर और मूर्तियों को देखकर किसी की भी नजरें बस टिकी की टिकी रह सकती हैं। यहां संगमरमर पर की गई नक्‍काशी किसी जादुगरी से कम नहीं लगती।

खुले आंगन में है श्रृंखला का यह पहला मंदिर

द‍िलवाड़ा मंदिर की श्रृंखला का सबसे पहला मंदिर है विमलावसाहि मंदिर। इसके निर्माण के बारे में जानकारी मिलती है कि इसे गुजरात के चालुक्‍य राजा भीम प्रथम के मंत्री विमल साह ने बनवाया था। इसलिए मंदिर का नाम भी उन्‍हीं के नाम पर पड़ा। बता दें कि 1031 ई में बना यह मंदिर जैन संत आदिनाथ को समर्पित है। बता दें कि आदिनाथ की प्रतिमा की आंखें असली हीरे से बनाई गई हैं। इसके अलावा बहुमूल्‍य रत्‍नों से इनका श्रृंगार किया गया है। यह मंदिर चारों ओर से घ‍िरे हुए गलियारों के बीच खुले आंगन में स्‍थ‍ित है। इसी स्‍थान पर तीर्थंकरों की मूर्तियों को स्‍थापित किया गया है।

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360 छोटे-छोटे तीर्थंकरों की मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध

दिलवाड़ा मंदिर की श्रृंखला का दूसरा मंदिर लूना वसाही है। भगवान नेमीनाथ को समर्पित इस मंदिर 360 छोटे-छोटे तीर्थंकरों की भी प्रतिमाएं हैं। यह इस मंदिर की खासियत भी है। इसके अलावा मंदिर का रंग मंडप यानी कि मुख्‍य हॉल और मंदिर की हाथीशाला में संगमरमर से बनें हाथी की सुंदरता देखते ही बनती है। यूं लगते हैं जैसे सब वास्‍तविक ही हों। बता दें कि इसका निर्माण 1203 में पोरवाड़ भाइयों तेजपाल और वस्‍तुपाल ने किया था। मंदिर में स्‍थापित तीर्थंकर नेमीनाथ की मूर्ति काले संगमरमर से निर्मित है। इसके अलावा मंदिर में एक काला कीर्ती स्‍तंभ भी है।

इसमें स्‍थापित है 4 हजार किलो की पंचधातु प्रतिमा

दिलवाड़ा मंदिर श्रृंखला का तीसरा मंदिर पीतलहर बेहद अद्भुत है। यह भगवान ऋषभदेव को समर्पित है। जानकारों के अनुसार, मंदिर में स्‍थापित ऋषभदेव की प्रतिमा में 4 हजार किलो की पंचधातु और सैकड़ों किलो सोने का प्रयोग किया गया है। इस मंदिर का निर्माण राजस्‍थान के भामाशाह ने करवाया था। कहा यह भी जाता है कि इस मंदिर के निर्माण में मजदूरों ने भी आर्थिक मदद की थी।

मंदिर श्रृंखला में सबसे ऊंचा है यह मंदिर

दिलवाड़ा मंदिर की श्रृंखला में चौथे स्‍थान पर बना श्री पार्श्‍वनाथ मंदिर सारे मंदिरों में सबसे ऊंचा है। इसका निर्माण 1458-59 में हुआ था। भगवान पार्श्‍वनाथ को समर्पित यह मंदिर तीन मंजिला बना हुआ है। इसकी बाहरी दीवारों पर बनाई गई सुंदर शिल्‍पाकृतियां और अन्‍य सजावटी शिल्‍पाकंन को देखकर आपको भी बरबस ही खजुराहो और कोणार्क के मंदिर याद आ जाएंगे। यह आकृतियां ग्रे बलुआ पत्‍थरों से उकेरी गई हैं।

अंतिम मंदिर समर्पित है भगवान महावीर को

दिलवाड़ा मंदिर की श्रृंखला का अंतिम मंदिर महावीर स्‍वामी मंदिर भगवान महावीर को समर्पित है। इसका निर्माण 1582 में हुआ था। यूं तो यह मंदिर अन्‍य मंदिरों की अपेक्षा छोटा है। लेकिन इसकी दीवारों पर की गई नक्‍काशी नायाब है। बताया जाता है मंदिर की ऊपरी दीवारों पर की गई खूबसूरत कलाकारी 1764 में श्रीरोही के कलाकारों ने की थी। मान्‍यता यह भी है कि मंदिर में संगमरमर का काम करने वाले कारीगरों को संगमरमर से एकत्रित धूल के अनुसार सोने का भुगतान किया जाता था। यही वजह थी कि वह और भी मन लगाकर बेहतरीन नक्‍काशी करते थे। बता दें कि दिलवाड़ा के ये मंदिर श्रद्धालुओं और पर्यटकों के दिलों में बसते हैं। कहा जाता है कि एक बार जिसने भी इन मंदिरों के दर्शन किए वह बस यहीं का होकर रह गया।