ईजी मनी का इफेक्ट: कोविड-19 की परेशानियों के बावजूद शेयर बाजार के आसमान छूने की वजह क्या है?

कोविड-19 के बीच पब्लिक और कॉरपोरेट वर्ल्ड भले परेशान रहा हो, शेयर मार्केट आसमान छू रहा है। कोरोना के चलते देश में रोज औसतन 224 लोग मर रहे हैं और बेरोजगारी दर नवंबर में 7.8 पर्सेंट पर पहुंच गई थी। भारत जैसे विकासशील देश ही नहीं, अमेरिका जैसे विकसित देशों का भी कमोबेश ऐसा ही हाल है, जहां स्टॉक मार्केट नई ऊंचाइयों पर जा रहा है। ऐसे में किसी भी शख्स को हैरत होगी कि इकनॉमी के साथ ऐसा क्या चल रहा है जो तार्किक नजरिए को धता बता रहा है।

कब से हुई भारतीय बाजार में हालिया तेजी की शुरुआत?

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जहां तक भारत की बात है तो सितंबर 2019 में खासतौर पर ग्रामीण भारत में दमदार मांग के चलते आर्थिक वृद्धि दर स्थिति बेहतर रहने वाली लग रही थी। तभी सरकार ने कंपनियों के लिए अगले तीन साल में होने वाले निवेश पर 15 पर्सेंट का कॉरपोरेट टैक्स तय कर दिया था। उससे शेयर बाजार में तेजी का दौर शुरू हुआ, लेकिन थोड़े समय बाद जीडीपी ग्रोथ 6 पर्सेंट से नीचे चली गई और शेयर बाजार पर भी दबाव बना।

कब बिगड़ने लगे हालात और कैसी हो गई इकनॉमी की स्थिति?

फरवरी 2020 में आर्थिक हालात बिगड़ने लगे और भारत सहित दुनियाभर में गतिविधियां थम सी गईं। जून तिमाही में जीडीपी ग्रोथ तेजी से गिरकर शून्य से 24 पर्सेंट नीचे चली गई, विकसित देशों की ग्रोथ थोड़ी बेहतर रही। दुनिया की स्थिति 2008 की आर्थिक मंदी से भी खराब हो गई। विकसित देशों ने अपने पुराने अनुभव को देखते हुए कर्ज सस्ता करने और लोगों के हाथों में पैसे देने के उपाय किए।

फेड रिजर्व सहित दुनिया भर के बैंकिंग रेगुलेटर ने क्या किया?

इकनॉमिक ग्रोथ को बढ़ावा देने के लिए फेड रिजर्व सहित दुनिया भर के बैंकिंग रेगुलेटर ने बड़े पैमाने पर रेट कट किए हैं। इन देशों में ब्याज दर शून्य के आसपास चल रही है। उसके चलते विकसित देशों की अर्थव्यवस्था में सितंबर 2020 वाले क्वॉर्टर में कमोबेश V शेप में रिकवरी हुई। अमेरिकी सरकार और फेड रिजर्व ने साफ कर दिया है कि वे बाजार और इकनॉमी को बढ़ावा देने के उपाय करते रहेंगे और आगे भी राहत पैकेज ला सकते हैं।

कब बढ़ता है शेयर जैसे जोखिम वाले एसेट में रिटेल इनवेस्टर्स का निवेश?

जब आसानी से पैसा आता है तो शेयर जैसे रिस्की एसेट में हर जगह के रिटेल इनवेस्टर्स का निवेश बढ़ता है। अमेरिका जैसे देशों के बड़े निवेशकों ने भारत जैसे विकासशील देशों के बाजारों में पैसे लगाए। यह ट्रेंड फिलहाल बने रहने की उम्मीद है। वैसे भी रिजर्व बैंक और केंद्र सरकार महंगाई को भूलकर इकनॉमी को बढ़ावा देने में लगे हैं। बैंकिंग सिस्टम में पैसा है और ब्याज भी कम है, सो कंज्यूमर्स और कंपनियों को कम ब्याज दर का फायदा होता रहेगा। कम ब्याज दर से कंज्यूमर्स की डिमांड बढ़ती रहेगी और कंपनियों के प्रॉफिट में बढ़ोतरी होगी।

इनवेस्टर सेंटीमेंट को पॉजिटिव बनाए रखने के लिए सरकार ने क्या किया?

सरकार ने इनवेस्टर सेंटीमेंट को पॉजिटिव बनाए रखने के लिए कई फैसले किए हैं। नए निवेश के लिए टैक्स के रेट घटाए हैं और मेक इन इंडिया अभियान के तहत 10 सेक्टर को प्रॉडक्शन लिंक्ड इनसेंटिव दिया जा रहा है। MSME को राहत देने के लिए भी कदम उठाए गए हैं और सरकारी कंपनियों के प्राइवेटाइजेशन को बढ़ावा दिया जा रहा है। इन सबसे देश की आर्थिक बुनियाद को मजबूती मिलेगी।​​​​​​

क्या डिस्कनेक्शन की वजह मौजूदा असलियत और आगे के अनुमान में फर्क है?

इकनॉमी और मार्केट में अभी जो डिस्कनेक्शन लग रहा है उसकी वजह मौजूदा असलियत और आगे के अनुमान में फर्क है। अगर आर्थिक वृद्धि दर उम्मीद के मुताबिक होती रही तो बाजार का प्रदर्शन बेहतर रह सकता है। लेकिन अमेरिका और यूरोप में कोविड-19 की दूसरी लहर चल रही है और नए सिरे से लॉकडाउन लग रहा है, जिसके चलते इकनॉमिक रिकवरी बेपटरी हो सकती है। यहां भी कुछ राज्यों में वायरस के नए स्ट्रेन मिले हैं जिसके चलते स्थिति बिगड़ सकती है क्योंकि यहां सरकारी राहत पैकेज बहुत कम (जीडीपी के दो पर्सेंट से कम) रहा है। इसलिए बिक्री में हालिया बढ़ोतरी पुरानी मांग या त्योहारी सीजन की बची मांग हो सकती है।

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क्या दिसंबर तिमाही के नतीजे दिखाएंगे मार्केट और इकनॉमी के टूटे रिश्तों का सच?

देश में रोजगार कोविड से पहले वाले लेवल से कम है और खास तौर पर सर्विसेज सेक्टर में बहुत से कारोबार बंद हुए हैं। ऐसे में सरकार की तरफ से राहत के और उपाय नहीं होने पर मांग में बाउंस बैक तेजी से नहीं होगा। अभी फाइनेंशियल सेक्टर पर बना दबाव चिंता का कारण बना हुआ है और असल तस्वीर दिसंबर तिमाही नतीजों के बाद ही नजर आएगी। यह तभी पता चलेगा कि भारतीय शेयर बाजार और अर्थव्यवस्था दोनों की चाल एक होगी या अलग-अलग, जैसा कि अब तक देखने को मिला है। अन्य खबरों के लिए इस लिंक पर क्लिक करें

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