मनुष्य का केवल एक ही धर्म है अगर आप इसे समझ लेंगे तो आप हमेशा खुश रहेंगे

एक विवाद को सुलझाने की प्रक्रिया के दौरान घटनास्थल पर एक व्यक्ति ने आक्रोशित हो पुलिस कप्तान की वर्दी पर थूक दिया। अपने वरिष्ठ अधिकारी के साथ हुई इस अभद्रता पर कप्तान के साथी पुलिस कर्मचारी उस व्यक्ति को पकड़ने के लिए आगे बढ़े। एक ने तुरंत रिवॉल्वर निकाल लिया और वह गोली चलाने ही वाला था कि तभी पुलिस कप्तान ने उससे रिवॉल्वर वापस रखने को कहा। पुलिस कप्तान ने रुमाल निकाला और थूक पोंछ कर रुमाल को फेंक दिया। इसके बाद थूकने वाले से बात करने लगे। सभी पुलिसकर्मी और मौके पर उपस्थित लोग यह देखकर विस्मित हो गए। पुलिस कप्तान ने उन सबको समझाते हुए कहा, ‘जो काम रुमाल से निपट सकता है उसके लिए रिवॉल्वर निकालने की कोई आवश्यकता नहीं।

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यह है सकारात्मक सोच। शांति और प्रसन्नता के साथ सफलता की बुनियाद भी यही सोच है। यही सार्थकता की नींव है, समृद्धि की कुंजी है, सुख का आधार है, स्वर्ग और आनंद का मार्ग है। इसी दृष्टिकोण को ठीक से न अपनाने के कारण व्यक्तिगत संबंधों में दरारें पड़ जाती हैं। इसका सबसे बड़ा प्रतिकूल प्रभाव धर्म और पंथ में बिखराव और अलगाव के रूप में दिखता है। अंतत: समाज टुकड़े-टुकड़े हो बिखरने लगता है।

किसी बगीचे में अगर कोई फर्नीचर बनाने वाला पहुंचेगा तो वह पेड़ की लकड़ी की क्वॉलिटी और मात्रा को देख कर सोचेगा इससे क्या-क्या बनाया जा सकता है। अपने अंतर्मन में शत्रुता के भाव लिए उस बगिया में पहुंचने वाला व्यक्ति कोई न कोई कांटा, सूखा पेड़-पत्ते ढूंढ ही लेगा। इसके उलट हृदय में प्रेम की सौगात रखने वाले व्यक्ति की दृष्टि खिलते पुष्पों एवं नवस्फुटित पल्लवों को निहारेगी। वह उनकी सुगंध और सौंदर्य का आनंद लेगा। यह दृष्टिकोण का अंतर ही तो है जो हमें दुख में भी सुख की अनुभूति देता है।

सकारात्मक सोच और सकारात्मक दृष्टिकोण का एकमात्र स्रोत है- नैतिकता का समावेश लिए धर्म। धर्म हमारे सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक आंतरिक मूल्यों का विशाल महासागर है। अलग-अलग होते हुए भी सभी धर्म मूलतः एक हैं। जो भी अंतर है वह सिद्धांतों का नहीं भाषा का है, कहने की शैली का है। ‘पंथ’ अर्थात मार्ग, रास्ता जो मंजिल तक पहुंचाता है। यहां मंजिल है -धर्म। अब तक की मुख्य और मनोवैज्ञानिक चुनौती यह रही है कि जनमानस में धर्म के लक्षणों में से अधिक से अधिक कैसे स्थापित किया जाए। इन्हीं उपायों को गौतम बुद्ध, महावीर, गुरुनानक ने अपने-अपने तरीके से बताया। जिन्हे हमने पंथ का नाम दे दिया है।

हमारे बीच सत्य को लेकर नहीं, प्रतिबिंबों को लेकर विवाद हैं। पांच कटोरों में पानी रखकर सूरज को देखा जाए तो उसके पांच प्रतिबिंब नजर आएंगे। लेकिन सूरज कभी भी पांच हिस्सों में नहीं बंट सकता। श्रेष्ठतम एवं सम्यक दृष्टिकोण यह है कि पांच कटोरों में सूरज का प्रतिबिंब दिखाई देने पर भी, बीस दीपकों की प्रकाश-ज्योति अलग से दिखाई देने पर भी हम इस बात पर विश्वास करें कि सूरज एक है, प्रकाश-ज्योति एक है। हम जानें कि बिंब और प्रतिबिंब में क्या भेद है। सूर्य, चंद्र को जानने के लिए कटोरे माध्यम तो हो सकते हैं। परंतु सूर्य या चंद्र कदापि नहीं बन सकते। पंथ कितने ही हों, मानवीय धर्म तो एक ही है और रहेगा।