जन्म से मृत्यु तक हर संस्कार में आम की मौजूदगी, रुके वृक्षों का तिरस्कार

आम का बहुत महत्व है. फल के स्वाद (Taste) और महत्व (Importance) से तो सभी परिचित ही हैं. अतः फल की बात यहां नहीं करेंगे. जिन्होंने और जिनके पिता- पितामह ने कभी आम का एक पौधा (Plant) भी नहीं रोपा वे भी बाज़ार से विभिन्न प्रजाति के आम खरीदकर स्वाद लेते ही हैं और आवश्यकता पड़ने पर पूजापाठ के लिए आम का पल्लव, समिधा और लकड़ी खरीदते ही हैं. यदि हम भारत की बात करें तो जागरूकता का स्तर बहुत गहन है. इसीलिए जन्म से मृत्यु पर्यन्त प्रत्येक संस्कार में आम की उपस्थिति है. कहीं समिधा के रूप में, कहीं पल्लव के रूप में, कहीं काष्ठ के रूप में. पल्लव के उपयोग से सभी परिचित हैं. पूजा में कलश के ऊपर रखने के लिये और हवन में घृत-समर्पण हेतु तथा द्वार पर वंदनवार हेतु ‘पल्लव’ अर्थात् आम के पत्तों का उपयोग होता है.

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दिल्ली जैसे महानगर में तो आम्र-पल्लव और बेलपत्र यहां तक कि दूर्वा भी बिकती है. बेलपत्र तो ‘बेलपत्र’ कहने से मिल जाता है. पर आम के ‘पल्लव’ के लिये ‘पत्ता’ कहना पड़ता है. क्योंकि विक्रेता और क्रेता दोनों उसका केवल पत्ते के रूप में ही क्रय-विक्रय करते हैं. पूजापाठ आदि विधानों के पीछे जो विज्ञान और प्रकृति संरक्षण के साथ स्वास्थ्य सुनिश्चित करने की व्यवस्था थी, उस पर किसी का ध्यान नहीं जाता.

जारी है प्रकृति पर कुठाराघात

आम का पत्ता खरीदते समय लोग इस बात पर विचार नहीं करते कि बेचने के लिये विक्रेता ने कहीं पूरा वृक्ष ही तो पर्णहीन नहीं कर दिया. दुःख इस बात का है कि ग्रामीण संस्कृति भी प्रकृति पर कुठाराघात में पीछे नहीं है. एक सामान्य उदाहरण यहां देना उपयुक्त है. विवाह-संस्कार में जो ‘शादी-समारोह’ होते हुये’ मैरिज’ और ‘वेडिंग’ तक सिमटता जा रहा है और मण्डम में जो मध्य में स्थित मुख्य स्तम्भ होता है वह एक हेंगा होता है. जिसे कुछ भागों में पाटा भी कहते हैं और सरावन के नाम से भी यह कहीं-कहीं जाना जाता है. जब बैलों से खेत की जुताई होती थी तब यह हेंगा जुताई के बाद ढेले आदि तोड़कर खेत को समतल करने का कार्य करता था. यह हेंगा का मुख्य कार्य था. इसका आनुषंगिक कार्य सावन में झूला बनना भी था.
सावन में हेंगा के दोनों ओर मोटी-मोटी रस्सियां बांधकर किसी वृक्ष की शाखा में लटकाकर इसका झूला बनाया जाता था. सावन हेंगा का विश्रामकाल होता था पर उसे झूला झूलने के कारण विश्राम नहीं मिलता था. यही हेंगा विवाह-मंडप में मध्य में स्थापित किया जाता है और विवाह-संस्कार सम्पन्न होने के बाद समधीगण पांच या सात की शुभ संख्या में इसको हिलाते हैं. जिसे हमारे यहां ‘माड़व हिलाई’ कहा जाता है. इसी में देवता-पित्तर (पितृ) आदि आवाहन करके बांधे जाते हैं. यह विवाह-संस्कार के शुभत्व को सुनिश्चित करता है. यह हेंगा आम की लकड़ी का बना होता है. या यूं कहें कि मंडप में वही हेंगा स्थापित किया जाता है जो आम की लकड़ी का हो. जब बैलों से जुताई होती थी तब हेंगा मिलना और हर घर में होना सहज था. पर अब तो वह इतिहास बन गया है. चूंकि मंडप में उसके स्थापन की परम्परा है, तो परम्परा निरन्तर चल रही है. जिसके यहां पुराना हेंगा अभी भी संरक्षित है. उसके यहां वही स्थापित किया जाता है. परन्तु जहां बैल वाला हेंगा मिलना दुर्लभ और असंभव है वहां अब आम की लकड़ी के पटरा से काम चलाया जाता है. मेरा मानना है कि कुछ वृक्ष जो देखते-देखते सूख गये और कंकाल बन गये, उन्होंने अवश्य आत्महत्या की होगी. मैं जब भी ऐसा पीढ़ा देखती हूं तो यही विचार आता है कि किस वृक्ष का शाखोच्छेद होकर यह बना होगा? ये परम्परायें इसीलिए बनायी गयीं थीं ताकि समाज बहुमूल्य फलदार वृक्षों का संरक्षण और संवर्धन करे. समाज ने वह कार्य किया भी.

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वृक्षों का ऐसा तिरस्कार

वृक्षारोपण, संरक्षण और संवर्धन करने वाले लोग उन वृक्षों का प्रयोग करें और उनके निरन्तर रोपण और संवर्धन हेतु प्रवृत्त रहें. यही इन परम्पराओं का मूलोद्देश्य है. आज परम्परायें हैं पर लोग उद्देश्य से भटक गये हैं. मूलोद्देश्य विस्मृत हो गया है. वृक्ष-प्रदत्त सर्वस्व चाहिये परन्तु वृक्ष भूमि न आवृत्त करे, उसकी पत्तियां न गिरें, उन्हें बहारना न पड़े. यह मानसिकता बहुत आत्मघाती है. आज इससे निकलकर संस्कारों, अनुष्ठानों, परम्पराओं के मूलोद्देश्य पर चिन्तन करते हुये आगे बढ़ने की आवश्यकता है. न्यथा बागों को खण्डहर करते-करते हम इतने भग्न हो जायेंगे कि हमारा भग्नावशेष भी नहीं बचेगा. यदि बाग कहीं पूरी पटीदारी (पूरे खानदान) की साझे की हो तब तो वृक्ष और शाखा कटाने की होड़ लग जाती है. इसी होड़ ने पूर्वजों के स्नेह और श्रम से सिंचित अनेक बागों को वृक्षविहीन कर दिया. वृक्षों का ऐसा तिरस्कार किया कि वे स्वतः सूख गये. मानों तिरस्कार देखकर उन्होंने आत्महत्या कर ली हो. अन्य खबरों के लिए इस लिंक पर क्लिक करें

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